आज वर्ल्ड बुक डे के अवसर पर लाइफ ऑफ़ पटना आपको नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में अनसुनी अनकहीं बातों के अवगत कराएगा|

प्राचीन काल से, भारत शिक्षा और धार्मिक अध्ययन का एक केंद्र रहा है । यह न केवल बार-बार भारत में हुई विभिन्न खोजों और आविष्कारों द्वारा, बल्कि उन महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों की संख्या से भी साबित हुआ है, जो भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं ।

ऐसी ही एक जगह थी, नालंदा विश्वविद्यालय, जिसे आधुनिक शिक्षा की दुनिया के अग्रणी जगहों में से एक माना जाता था|

नालंदा विश्वविद्यालय

इस महान विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तकालीन सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 413-455 ईपू में की। इस विश्वविद्यालय को कुमारगुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग और संरक्षण मिला। ह्नेनसांग के अनुसार 470 ई. में गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालंदा में एक सुंदर मंदिर निर्मित करवाकर इसमें 80 फुट ऊंची तांबे की बुद्ध प्रतिमा को स्थापित करवाया।

नालंदा विश्वविद्यालय

800 से अधिक वर्षों के लिए नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक रहा था। जहां अध्ययन करने के लिए दुनिया भर से छात्र यहां आए करते थे। यह तीन भवनों में फैला हुआ था: रत्नसागर, रत्नादादी और रतनरंजका। प्रत्येक पुस्तकालय भवन तो 9 तलों का हुआ करता था। और इसमें पुस्तकों का एक विशाल संग्रह था जो धर्म, साहित्य, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और भी बहुत कुछ के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था| कहा जाता है कि यहाँ लगभग दुनिया भर की अहम किताबे पाई जाती थी|

अपनी महिमा के चरम पर, नालंदा विश्वविद्यालय न केवल बौद्ध अध्ययन के लिए समर्पित था, बल्कि ललित कला, चिकित्सा, गणित, खगोल विज्ञान, राजनीति और युद्ध की कला में छात्रों को प्रशिक्षित करता था।

नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया बहुत कठोर और कठिन मानी जाती थी। छात्रों को अपनी क्षमता साबित करने के लिए तीन स्तरों के परीक्षणों से गुजरना पड़ा। विश्वविद्यालय में बेजोड़ अनुशासन और नियमों को आवश्यक माना गया। यह माना जाता है कि महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट विश्वविद्यालय के प्रमुख थे।

इससे पहले कि यह कोरिया, जापान, फारस, तिब्बत, चीन, ग्रीस और ग्रेटर ईरान जैसे स्थानों से विद्वानों और शिक्षकों को नष्ट कर दिया गया था। एनयू में अध्ययन करने वाले उल्लेखनीय विद्वानों में हर्षवर्धन, वसुबंधु, धर्मपाल, सुविष्णु, असंग, धर्मकीर्ति, शांताशक्ति, नागार्जुन, आर्यदेव, पद्मसंभव, जुआनजैंग और ह्वुई ली शामिल थे। विश्वविद्यालय का परिसर इतना विशाल था कि उनमें 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 शिक्षक थे। इसे एक वास्तुशिल्प कृति के रूप में माना जाता था, और एक लंबी दीवार और एक मजबूत गेट द्वारा चिह्नित किया गया था।

नालंदा विश्वविद्यालय

अभिलेखों के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय को आक्रमणकारियों द्वारा तीन बार नष्ट किया गया, लेकिन केवल दो बार पुनर्निर्माण किया गया। स्कंदगुप्त (455–467 ई।) के शासनकाल के दौरान मिहिरकुला के तहत हूणों द्वारा पहला विनाश हुआ था। लेकिन स्कंद के उत्तराधिकारियों ने पुस्तकालय को बहाल किया और इसे और भी बड़ी इमारत के साथ बेहतर बनाया।

दूसरा विनाश 7 वीं शताब्दी की शुरुआत में गौड़ों द्वारा किया गया था। इस बार, बौद्ध राजा हर्षवर्धन (606–648 ई।) ने विश्वविद्यालय को पुनर्स्थापित किया।

तीसरा और सबसे विनाशकारी हमला तब हुआ जब 1193 में तुर्की के नेता बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में मुस्लिम सेना द्वारा प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया गया था। यह माना जाता है कि भारत में एक प्रमुख धर्म के रूप में बौद्ध धर्म को नुकसान के कारण सैकड़ों वर्षों के लिए झटका लगा था। हमले के दौरान धार्मिक ग्रंथों का। और, तब से, हाल के घटनाक्रमों तक एनयू को बहाल नहीं किया गया है।

ऐसा कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी बीमार पड़ गए थे और उनके दरबार में डॉक्टर उनका इलाज करने में नाकाम रहे थे। फिर, किसी ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल राहुल श्री भद्र द्वारा खुद को ठीक करने की सलाह दी।

खिलजी को अपनी इस्लामी संस्कृति पर बहुत गर्व था और उसने अपने धर्म से बाहर के व्यक्ति द्वारा खुद का इलाज करने से इनकार कर दिया। लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और उन्हें नालंदा से भद्रा को आमंत्रित करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा।

लेकिन खिलजी ने एक शर्त रखी और भद्रा को बिना किसी दवा के उसे ठीक करने के लिए कहा। भद्र ने फिर खिलजी को अपनी बीमारी के उपाय के रूप में कुरान के कुछ पन्ने पढ़ने को कहा और सभी को आश्चर्यचकित कर दिया कि खिलजी ठीक हो गया।

इस तथ्य से परेशान कि एक भारतीय विद्वान और शिक्षक अपने दरबार के डॉक्टरों से अधिक जानते थे, खिलजी ने देश से ज्ञान, बौद्ध धर्म और आयुर्वेद की जड़ों को नष्ट करने का फैसला किया। उन्होंने नालंदा के महान पुस्तकालय में आग लगा दी और लगभग 9 मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया।

Nalanda Library

पुस्तकालय इतना विशाल और मजबूत था कि इसे पूरी तरह से नष्ट करने में तीन महीने लग गए। तुर्की के आक्रमणकारियों ने विश्वविद्यालय में भिक्षुओं और विद्वानों की भी हत्या कर दी।

खिलजी ने बिहार में चुन-चुनकर सभी बौद्ध मठों को नष्‍ट कर दिया था और लोगों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर कर दिया था। इस्‍लामी चरमपंथियों ने गया के बोधिस्‍थल को अपने हमले के लिए चुना। ये कहें कि बौद्ध धर्म को मिटाकर ही इस्‍लाम का अभ्‍युदय हुआ, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इतिहास गवाह है, तथ्य गवाह है। नालंदा की हजारों जलाई गईं पुस्तकों के कारण बहुत-सा ऐसा ज्ञान विलुप्त हो गया, जो आज दुनिया के काम आता।

बख्तियार खिलजी ने सेना के अभाव में अरक्षित नालंदा विश्वविद्यालय पर कहर बरपा दिया। हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्षुओं का संहार किया गया। शिक्षक और विद्यार्थियों के लहू से पूरी धरती को पाटकर भी जब अहसानफरामोश खिलजी को चैन नहीं मिला, तो उसने एक भव्य शिक्षण संस्था में आग लगा दी।

बख्तियार खिलजी धर्मांध और मूर्ख था। उसने ताकत के मद में बंगाल पर अधिकार के बाद तिब्बत और चीन पर अधिकार की कोशिश की किंतु इस प्रयास में उसकी सेना नष्ट हो गई और उसे अधमरी हालत में देवकोट लाया गया था। देवकोट में ही उसके सहायक अलीमर्दान ने ही खिलजी की हत्या कर दी थी।

बख्तियारपुर, जहां खिलजी को दफन किया गया था, वह जगह अब पीर बाबा का मजार बन गया है। दुर्भाग्य से कुछ मूर्ख हिन्दू भी उस लुटेरे और नालंदा के विध्वंसक के मजार पर मन्नत मांगने जाते हैं। दुर्भाग्य तो यह भी है कि इस लुटेरे के मजार का तो संरक्षण किया जा रहा है, लेकिन नालंदा विश्‍वविद्यालय का नहीं। साथ आज बिहार में बख्तियार खिलजी के नाम पर स्टेशन का नाम भी रखा गया है|

ये बहुत दुर्भाग्य की बात है कि आज बिहार की किसी भी एतिहासिक जगहों की ठीक से देख भाल नही हो रही है चाहे वो रोहतास किला हो या नालंदा| आज हम वर्ल्ड बुक डे पर यही उम्मीद करते हैं की राज्य सरकार और केंद्र सरकार कम से कम इस विश्वविद्यालय की इतिहास बचाने में सफल हो|