वैसे तो हमारे देश की मीडिया के पास काम की ख़बरों के लिये कम ही समय होता है, पर पिछले दिनों आप सब ने बिहार की ज्योति कुमारी का चित्र लगभग हर न्यूज़ चैनल पर ही देखा होगा | जी हाँ, वही ज्योति कुमारी जिसने अपने बीमार पिता को लेकर 1200 किलोमीटर से भी ज्यादा की दुरी साईकल से तय करते हुए अपने घर पहुँची |  

पर यहाँ भी मीडिया ने सरकार से काम का सवाल पूछने की जगह तमाशा दिखाना ही जरूरी समझा | कल तक अन्न के एक-एक दाने को मोहताज ज्योति अचानक पुरे देश मे हीरो बन गयी और हर कोई उसके साहस व बहादुरी की तारीफ़ करने लगा | यहाँ तक की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी इवांका ट्रम्प भी इस से काफी प्रभावित हुई |

सरकार से कुछ सवाल 

किसी ने भी ये सवाल पूछने की कोशिश नही की कि आखिर क्यों ज्योति को इतनी छोटी उम्र मे इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा | क्या उसके पास ये साहस दिखाने के अलावा कोई और रास्ता था ? वो क्या वजहें हैं जो ज्योति जैसी छोटी लडकियो को ये साहस दिखाने पर मजबूर कर देती हैं ? क्या इसके लिये हम सरकारें चुनते हैं ? और सिर्फ ज्योति ही नही, देश के कई मजदूर अगर हर रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने अपने घरों की ओर जाने को मजबूर हैं तो ये किसकी गलती है तथा उन्हें घर तक सही सलामत पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी है ? 

ज्योति कुमारी तथा उसके जैसे लाखों लोग पहले भी अपनी गरीबी का ख़ामियाज़ा भुगत चुके हैं तथा इस बात के भी पुरे आसार हैं कि आगे भी भुगतते रहेंगे | अतः अगर सच मे हम इनकी स्थिति मे सुधार देखना चाहते हैं तो हमे इस घटना पर गौरवान्वित महसूस करने की जगह आत्मग्लानी होनी चाहिए तथा सत्ता मे बैठे लोगों से सवाल करना चाहिए | 

घटना एक जैसी पर व्यवहार अलग 

एक तरफ जब महाराष्ट्र के औरंगाबाद मे रेल पटरियों पर पैदल चलते हुए 16 मजदूर कट जाते हैं तो सरकार कहती है कि उन्हें पैदल चलने की क्या जरूरत थी तथा उन्हें पटरियों पर नही चलना चाहिए था | दूसरी तरफ ज्योति 1200 किलोमीटर साईकल चलाकर अपने घर पहुचती है तो उसकी सराहना की जाती है | भगवान न करे अगर ज्योति को भी कुछ हो जाता तो भी क्या ये मीडिया तथा सरकार उसके साहस की सराहना कर रही होती ? क्या किसी काम का सफल या असफल होना इस बात का निर्णय करता है कि वो साहस था या गलती ?

एक सुपरपावर तथा जगतगुरु बनने क ख्वाब रखने वाले देश के लिये इस से ज्यादा शर्मनाक बात हो ही नहीं सकती कि जब पूरा देश कोरोना से निपटने मे लगा है तब उसके हाईवे पर मजदूरों की भीड़ अपने घर जाने की कवायद मे जुटे हैं | प्रधानमंत्री एक तरफ “बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” का नारा देते हैं तो दूसरी तरफ 15 साल की एक लडकी 1200 किलोमीटर साईकल चलाकर अपने घर पहुचती है | हमारे द्वारा आज उठाये गये सवाल ये तय करेंगे कि हमारा कल कैसा होगा |