कोरोनवायरस तथा उसके बाद लगाये गये लॉकडाउन के बाद से भारत मे प्रवासी मज़दूरों की समस्याएं खुलकर सामने आई हैं | हालाँकि देश की मुख्यधारा की मीडिया अब भी इनके द्वारा झेले जा रहे समस्याओं से अनभिज्ञ है या यूँ कहें कि अनभिज्ञ होने का नाटक कर रही है | पर इन मज़दूरों के द्वारा झेले जा रही परेशानियों ने लगभग देश के हर इंसान  का ध्यान आकर्षित किया है |

आंकड़ों पर एक नजर

अगर आंकड़ों पर एक नजर डालें तो हमे ये पता चलता है कि लगभग 50 प्रतिशत मजदूर देश के केवल 54 जिलों से आते हैं | और इन 54 जिलों मे से भी 44 उत्तर प्रदेश तथा बिहार के हैं | इनमे से 24 जिले उत्तर प्रदेश के तथा 20 बिहार के हैं |

अगर हमे इसे सरलता से समझना हो तो हम ऐसे देख सकते हैं कि देश मे कुल 739 जिले हैं जिनमे 54 जिले ऐसे हैं जहां के मजदूर काम की तलाश मे सबसे ज्यादा पलायन करते हैं, और इन 54 जिलों मे से 20 जिले बिहार के हैं |

ये जिले हैं मधुबनी, दरभंगा, सिवान, सारन, समस्तीपुर, पटना, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, गोपालगंज, मुज़फ़्फ़रपुर, वैशाली, बेगूसराय, भोजपुर, भागलपुर, मुंगेर, नालंदा, रोहतास, औरंगाबाद, नवादा, तथा गया | 

मजदूरों की खस्ता हालत

ऐसे मे इस बात मे कोई आश्चर्य की बात नहीं है की लॉकडाउन की मार भी सबसे ज्यादा बिहार के लोग ही झेल रहे हैं | हर देश के लगभग हर प्रमुख शहर से बिहार तक आने वाली सड़कों पर बिहारी मज़दूरों का जत्था देखने को मिल ही जाते हैं | श्रमिक ट्रेनों के चलने के बाद भी मजदूर उसपर आने मे असमर्थ थे क्यूँकि इसका किराया उनके बजट के बाहर था (अब बिहार सरकार ने उनके किराये वापस करने का वादा किया है ) |

सरकार की नाकामी  

इतनी बुरी हालत का एक कारण मज़दूरों की बड़ी संख्या तो है ही पर दुर्भाग्यवश यह इकलौता कारण नही है | इसका दूसरा तथा सबसे बड़ा कारण है सरकार की तरफ से इच्छाशक्ति की कमी | सरकार अगर चाहे तो इनकी मुश्किलें काफी हद तक आसान हो सकती हैं | सरकार के पास एक स्पष्ट प्लानिंग की कमी साफ़ तौर पर दिखाई देती है | शुरुआत मे तो सरकार जैसे इन मज़दूरों को भूल ही गयी थी | और ट्रेन अगर चलाये भी गये तो काफी देर से | न तो मज़दूरों को स्पष्टतः किसी भी जानकारी से अवगत कराया जा रहा है तथा न ही उनके यहाँ आने के बाद क्वारंटाइन की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं |

राज्य मे सरकार की भूमिका 

और अगर इतनी बड़ी जनसंख्या काम की तलाश मे पलायन कर रही है तो उन्हें अपने राज्य मे ही काम देने की ज़िम्मेदारी किसकी है ? पिछले 15 सालों से शासन कर रही JDU-BJP की गठबंधन वाली सरकार ने इनके लिये क्या कदम उठाये हैं ?  बिहार की जनता को अगर काम चाहिए होता है तो वो दूसरे राज्य का रुख करते हैं, उच्च शिक्षा चाहिए होती है तो भी उन्हें दूसरे राज्य जाना पड़ता है, यहाँ तक की अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए होती है तो भी वो बिहार से बाहर ही जाते हैं | ऐसे मे सरकार क्या कर रही है ?  सुशासन के नाम पर बनी ये सरकार क्यूँ कोई भी समस्या आने पर असहाय सी नजर आती है ?

जनता को चुनाव से पहले सरकार से ये प्रश्न तो पूछने ही चाहियें | क्यूँकि मीडिया तो वैसे भी सरकार से सवाल पूछने से रही |