वो कहते हैं न कि चुनाव के मौसम मे नेताजी को जनता की याद आती है | बिहार मे भी अक्टूबर मे विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं | ऐसे मे बिहार के नेताओं ने जनता जनार्दन को याद करना फिर आरम्भ कर दिया है | अब अगले कुछ महीनों तक राज्य की क्या तस्वीर रहेगी इस बात की कल्पना करना ज्यादा मुश्किल नहीं है | नेताजी लंबी-लंबी  भाषणबाजी करेंगे, बड़ी बड़ी रैलियाँ होंगी, कुछेक क्राइम भी होंगी और फिर अंततः चुनाव होगा | 

इसी सिलसिले को जारी रखते हुए नीतीश कुमार ने बयानबाजी शुरू कर दी है | उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कोरोना संक्रमण के दौरान सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों से अवगत कराया। साथ ही आगे की योजनाओं की भी जानकारी दी। उन्‍होंने बताया कि आगे राज्‍य के स्‍कूल-कॉलेजों में पढ़ाई शुरू होगी। साथ ही सरकार बाहर से लौटे सभी लोगों को रोज़गार देगी।

बाहर से लौटे लोगों को यहीं देंगे रोजगार

मुख्‍यमंत्री ने बताया कि तीन मई के बाद बाहर से लौटे लोगों में तीन हजार लोग संक्रमित पाए गए हैं। उन्‍होंने सवाल किया कि एक देश का आदमी देश में दूसरी जगह जाए तो उसे प्रवासी क्‍यों कहते हैं? ऐसे लौटे लोगों को बिहार में रोजगार देने का काम चल रहा है। बिहार में बाहर से आए सभी लोगों को सरकार रोजगार देगी। यह भी कहा कि राज्‍य में बाहर से आगे वाले अधिकांश लोग आ चुके हैं, इसलिए अब क्‍वारंटाइन सेंटर बंद किए जाएंगे। क्‍वारंटाइन सेंटर में रखे गए हर व्‍यक्ति पर 5300 रुपये का खर्च किया गया।

आंकड़ों का स्त्रोत क्या है ? 

मुख्यमंत्री के ये सारे बयान सुनने मे तो बड़े अच्छे लगते हैं पर साथ साथ यह सवाल भी उठता है कि क्यूँ जनता उनकी बात का विश्वास करे ? साथ साथ उनके द्वारा किये गये आंकड़े कहीं से भी विश्वसनीय नहीं लगते | उनके अनुसार हर व्यक्ति जिसे क्‍वारंटाइन सेंटर मे रखा गया उसपर 5300 रुपये खर्च किये गये | पर अलग अलग रिपोर्ट के अनुसार कई क्‍वारंटाइन सेंटर ऐसे भी थे जहाँ सरकार की तरफ से कोई इंतजाम नहीं किये गये थे | साथ साथ कई क्‍वारंटाइन सेंटर ऐसे थे जहां की एक भी लोग मौजूद नहीं थे फिर भी अधिकारी लाखों रुपये घोटाले कर रहे थे |

नौकरियाँ अब तक कहाँ थीं ?

एक सवाल ये भी बनता है कि जब मुख्यमंत्री वादा कर रहे हैं कि बिहार से रोज़गार की आशा मे बाहर जाने वालों को बिहार मे ही रोज़गार देने की व्यवस्था है तो ये रोज़गार अबतक क्यों नहीं मिले और चुनाव का समय आते ही कैसे ये रोज़गार पनप गये ? साथ साथ पढाई के लिये भी लाखों छात्र बिहार से बाहर जाते हैं जहां उनके साथ बाहरी लोगों जैसा व्यवहार होता है, सरकार ने अबतक उन छात्रों के लिये क्या किया ? क्यूँ बिहार मे आज भी 3 साल का स्नातक 5 सालों मे हो रहा है ? बिहार बोर्ड से पढने वाले छात्रों की ये दुर्दशा क्यूँ है ? 

चुनावी जुमले 

सरकार के पिछले 15 सालों का प्रदर्शन देखकर तो यही लगता है कि ये सब और कुछ नहीं बस चुनावी जुमले हैं | क्यूँकि अगर सरकार करना चाहती तो पिछले 15 सालों मे बहुत कुछ कर चुकी होती | आज नीतीश कुमार कहते हैं कि कोई जब बिहार मजदूरों को प्रवासी बोलता है तो उन्हें काफी तकलीफ़ होती है, पर ये मजदूर तो कई सालों से अपना जीवन यापन प्रवासी बनकर ही करते आये हैं | नीतीश जी शायद जनता को अपने मगरमच्छ के आँसू दिखाना चाहते हैं |