यह समाज एक बड़े परिवार की तरह है जहां कई धर्म और जाति के लोग एक साथ मिलकर रहते हैं. लेकिन समाज को समाज बनाने का काम करते हैं समाज के शिल्पकार यानि शिक्षक. शिक्षक समाज के ऐसे शिल्पकार होते हैं जो बिना किसी मोह के इस समाज को सजाते हैं.

संस्कृत में एक बहुत ही मशहूर कहावत है:

मातृ देवो भव:
पितृ देवो भव:
आचार्य देवो भव:

अर्थात माता-पिता और आचार्य भगवान के समान होते हैं. माता-पिता हमें पैदा करते हैं और जीना सिखाते हैं लेकिन हमें समाज के लायक बनाने में सबसे बड़ा हाथ हमारे शिक्षकों का है. इसीलिए भारत में शिक्षक को भगवान माना जाता है. भारतीय समाज में शिक्षकों को प्राचीन काल से ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. गुरू के कथन पर अपनी जान को भी न्यौछावर करने की कई कथाएं हमारी संस्कृति में शामिल हैं. एकलव्य ने अपने गुरू के कहने पर अपना अंगूठा दान कर दिया था तो वहीं राम युग में भी हमें गुरू-शिष्य की परंपरा देखने को मिलती है.

शिक्षकों को समाज का शिल्पकार इसलिए भी कहा जाता है क्यूंकि वह बच्चों को समाज में रहना सिखाते हैं. जो शिक्षा बच्चे स्कूल में सीखते हैं उसे ही वह अपने व्यवहारिक जीवन में अमल में लाते हैं. भारत में पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरुकता लाने के मकसद से इसकी शुरुआत की गई थी. हालांकि विश्व में शिक्षक दिवस पांच अक्टूबर को मनाया जाता है.

Sarvepalli Radhakrishnan

भारत में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. इस दिन देश के द्वितीय राष्ट्रपति रहे राधाकृष्णन का जन्मदिवस होता है. शिक्षकों की महत्ता को सही स्थान दिलाने के लिए ही हमारे देश में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पुरजोर कोशिशें की जो खुद एक बेहतरीन शिक्षक थे.

Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Profile: जमीन से आसमां तक का सफर –

स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के एक पवित्र तीर्थ स्थल तिरुतनी ग्राम में हुआ था. इनके पिता सर्वपल्ली विरास्वामी एक गरीब किंतु विद्वान ब्राम्हण थे. इनके पिता पर एक बड़े परिवार की जिम्मेदारी थी इस कारण राधाकृष्णन को बचपन में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शुरुआती जीवन तिरुतनी और तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही बीता. यद्यपि इनके पिता धार्मिक विचारों वाले इंसान थे लेकिन फिर भी उन्होंने राधाकृष्णन को पढ़ने के लिए क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में दाखिल कराया. इसके बाद उन्होंने वेल्लूर और मद्रास कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त की.

सन 1902 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंकों में उत्तीर्ण की जिसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की गई. कला संकाय में स्नातक की परीक्षा में वह प्रथम आए. इसके बाद उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर किया और जल्द ही मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए. डॉ. राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया.

Dr. Sarvepalli Radhakrishnan in politics:राष्ट्रपति पद की ओर कदम –

डॉ. राधाकृष्णन अपनी प्रतिभा का लोहा बनवा चुके थे. उनकी योग्यता को देखते हुए ही उन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया था. वह 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे. इसी बीच वह ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किए गए. जब भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से यह आग्रह किया कि वह विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें. 1952 तक वह राजनयिक रहे. इसके बाद उन्हें उपराष्ट्रपति के पद पर नियुक्त किया गया. संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिए काफ़ी सराहा. 1962 में राजेन्द्र प्रसाद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राधाकृष्णन ने राष्ट्रपति का पद संभाला. राजेंद्र प्रसाद की तुलना में इनका कार्यकाल काफी चुनौतियों भरा था. क्योंकि जहां एक ओर भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हुए जिसमें चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पड़ा. वही दूसरी ओर दो प्रधानमंत्रियों का देहांत भी इन्हीं के कार्यकाल के दौरान ही हुआ था. 1967 के गणतंत्र दिवस पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने देश को सम्बोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था कि वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे. यद्यपि कांग्रेस के नेताओं ने उनसे काफ़ी आग्रह किया कि वह अगले सत्र के लिए भी राष्ट्रपति का दायित्व ग्रहण करें, लेकिन राधाकृष्णन ने अपनी घोषणा पर पूरी तरह से अमल किया.

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दिए गए सम्मान –

शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक डॉ. राधाकृष्णन को देश का सर्वोच्च अलंकरण “भारत रत्न” प्रदान किया. राधाकृष्णन के मरणोपरांत उन्हें मार्च 1975 में अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है. इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे. उन्हें आज भी शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श शिक्षक के रूप में याद किया जाता हैं.

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन –

17 अप्रैल, 1975 को सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लंबी बीमारी के बाद अपना देह त्याग दिया.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के ज्ञानी, एक महान शिक्षाविद, महान दार्शनिक, महान वक्ता होने के साथ ही विज्ञानी हिन्दू विचारक भी थे. राधाकृष्णन ने अपने जीवन के 40 वर्ष एक शिक्षक के रूप में व्ययतीत किए थे. वह एक आदर्श शिक्षक थे.

शिक्षक दिवस और भारत –

आज के दिन भारत के कई शहरों में उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं. भारत में गुरू शिष्य की परपरा बरसों से चली आ रही है जिसमें कई बार गलत वजहों से यह रिश्ता कलंकित भी हुआ जैसे शिक्षकों द्वारा छात्रों को क्रूर शारीरिक दंड देना और कई बार छात्रों द्वारा भी गुरू पर हाथ छोड़ देना आदि.

लेकिन इन सब के बावजूद भी गुरू और शिष्य का रिश्ता हमेशा अपनी पवित्रता के लिए जाना जाएगा. हर इंसान को समाज के लायक बनाने में शिक्षकों का जो योगदान है उसे हम कभी भूल नहीं सकते हैं.

 

“शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे” – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ. राधाकृष्णन के यह शब्द समाज में शिक्षकों की सही भूमिका को दिखाते हैं. शिक्षक का काम सिर्फ किताबी ज्ञान देना ही नहीं बल्कि सामाजिक परिस्थितियों से छात्र को परिचित कराना भी होता है.

Source – Blogspot